Radharamano Vijayate

Hindi —
*कथा सूत्र*
*मनमाधवगौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज*
*जीव का स्वरूप*
गुरुदेव महाराज कहते हैं कि यह जीवन एक नाटक की तरह चल रहा है, तो नाटक को गंभीरता से तो करना है, लेकिन उसके पात्र को गंभीरता से नहीं लेना है तभी तुम सारे नाटक कर सकते हो। एक कलाकार अपनी कला के प्रति गंभीर है, मगर जो पात्र उसे मिला है ,उसे पात्र के प्रति गंभीर नहीं है। किसी नाटक में अगर वह पिता बना हो, तो पिता के उसे पात्र के प्रति गंभीर है, लेकिन पिता के प्रति गंभीर नहीं है। अगर वह पिता के प्रति गंभीर हो गया, तो कभी पुत्र नहीं बन पाएगा, कभी पति नहीं बन पाएगा। वह अपनी कला के प्रति गंभीर है, उसे पात्र जो मिला है उसे रोल जो मिला है बस रोल के प्रति गंभीर है। ऐसे ही आप सारी चीज का अभिनय बहुत ज़ोर से कीजिए ऐसे कीजिए कि कोई कार्य ही ना पाए, छाप छोड़ जाएं। जैसे कोई कलाकार का रोल हर 15 दिन बाद बदलता है, उसका नाम बदलता है, लेकिन वह अपना असली नाम तो याद रखता है। बस यही काम हमें करना है, हमको सैकड़ो नाम मिलेंगे, किसी जन्म में पिता का नाम मिलेगा, किसी जन्म में पुत्र का नाम मिलेगा, किसी जन्म में गुरु का नाम मिलेगा, इसी तरह किसी जन्म में स्त्री, किसी जन्म में पुरुष, सैकड़ो नाम मिलेंगे। लेकिन कृष्ण दास कविराज जी कहते हैं, कि अगर कोई तुमसे तुम्हारा असली नाम पूछे तो सिर्फ यही कहना *जीवेर स्वरूप होय नित्य कृष्ण दास*
*गुरुदेव समर्पणम*
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन माध्व गोडेशवर वैष्णवआचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महराज ||
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