
ब्राह्मण जब जनेऊ धारण करता है तो उसको गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। उसको सावित्री दीक्षा कहते हैं। बाद में उसको आजकल कई संस्था ब्राह्मण दीक्षा भी कहती है। अच्छी बात है संत ने कहा है पर ब्राह्मण दीक्षा कोई शास्त्रीय शब्द नहीं है। कहीं शास्त्रों में उसका वर्णन नहीं है।
ब्राह्मण वर्ण का नाम है, दीक्षा का नाम नहीं है। ब्राह्मण स्पेसफिक वर्ण का नाम है, दीक्षा तो मंत्र की ही होती है। सावित्री की दीक्षा है, यज्ञोपवीत की दीक्षा है। यही शब्द का प्रयोग है। ये विचार की बात है।
ये बहुत सेंसिटिव मैटर है। इस चीज पर चरचा शास्त्र के अनुगत में हो सकती है। पर मैं एक बात और कहूँ
कोई कुछ भी कहे, आपकी जहाँ दीक्षा है और जो आपके सद्गुरु कहें, आपके लिए उससे बड़ी बात दूसरी नहीं हो सकती।
और जो इस प्रणाली में समर्पित है, कोई कुछ भी कहे, आपके लिए गुरु परम्परा के द्वारा कही बात प्रधान है। और अगर आप कहीं किसी भी गुरु परम्परा में दीक्षित हैं और कहीं से कुछ कहा जा रहा हो पर आपके लिए आपकी परम्परा की बात प्रधान होनी चाहिए।
पर बात शास्त्र प्रधान होनी चाहिए।
इसलिए हमारे यहाँ विशुद्ध गोपाल मंत्र का क्रम आया है। कहाँ से आया? वो यहीं से उतर कर आया है जो विशुद्ध शास्त्र का मंत्र केशव भारती जी को देकर के लेते हैं वो कृष्ण मंत्र की उपासना श्रीमनमहाप्रभुजी विशुद्ध रूप से श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीजी महाराज को प्रदान करते हैं। और वहीं से हमारे यहाँ दीक्षा क्रम चलता है। तभी वो हमारे आचार्य परम्परा में आते हैं। इसीलिए इष्ट हैं हमारे।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
