
भगवत संयोगानुभूति ही अपरस है और भगवत वियोगानुभूति ही सपरस है। ठाकुरजी हमारी सेवा को प्रत्यक्ष स्वीकार कर रहे हैं यह भगवत संयोगानुभूति ही अपरस है।
कई बार साफ-सफाई करते समय कोई राधारमणजी के जगमोहन पर जा सके पर वो सपरस ही माना जाएगा। क्योंकि संयोगानुभूति नहीं है और कई बार मैं निवेदन करूँ, कभी-कभी कोई विशुद्ध आचार्य गोस्वामी बड़े लाड-भाव से पीछे से दर्शन करें। अनेकों गोस्वामी ऊपर भीतर तक जावे पर जब आएंगे तो सबसे पीछे खड़े हो जाएंगे, सबको आगे करेंगे पर फिर भी अपरस का ही स्वरूप धारण करेंगे। क्योंकि ठाकुर जी ने उनको अपना स्वीकार कर लिया है।
हम ठाकुरजी को अपना स्वीकार करें यह सपरस की स्थिति है और ठाकुरजी हमको अपना स्वीकार कर लें, यही सपरस का स्वरूप है।
उतना स्नान कर ले, वही कंठी धारण कर ले, वही तिलक लगा ले, वही मंत्र ले ले, वही यज्ञोपवित् धारण कर ले; सब कर ले पर उसके बाद भी श्रीठाकुरजी के आचार्य द्वारा स्थाई की हुई उस पद्धति के अनुसार उसकी स्वीकृति नहीं है, ठाकुरजी ने उसको स्वीकार नहीं किया तो पूरा अपरस होते हुए भी टहलुआ अपरस तो हो सके पर सेवा वाला अपरस न हो सके।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
