
श्री राधारमणो विजयते||
एक गुरु होता है निषिद्ध गुरु। जो हमें शिक्षा देता है यह न करना। ना करना मतलब उसे देखकर हम ऐसे ना हो जाए। निषिद्ध मतलब नहीं, ऐसा नहीं होना।
उदाहरण के लिए जैसे किसी परंपरा में रावण के लिए कुछ ऐसी दृष्टि रखते हैं उसके लिए भी यह समझ आता है कि जीवन में कभी रावण जैसे मत होना।
किसी के जीवन को देखकर जब यह अनुभव हो कि ऐसे नहीं होना। जैसे हम भीष्म को देखकर कहते हैं महाभारत में भीष्म जैसा महान कौन होगा पर उसके बाद भी यह हमने एक चीज सीखी की अपने जीवन में किसी व्यवस्था के प्रति इतने ज्यादा मत बंध जाना की धर्म को भी कंप्रोमाइज करना पड़ जाए।
और दूसरा अर्थ यह है जो किसी दूसरे के अहित के लिए आपकी योजना बनाएं। जैसे शकुनी दुर्योधन के लिए खूब सलाह देता है सलाह तो सही रहता है पर उनको सलाह देता है कि पांडवों का कैसे अहित हो।
अहित में जो उत्साह दे। उसमें सुधरे नहीं। राजनीति की सलाह दे, धर्मनीति की सलाह दे, किसी यंत्र तंत्र की सलाह दे उसे शास्त्र में कहा है निषिद्ध गुरु।
बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे व्यक्ति से दूर रहता है। उसकी भी आवश्यकता है।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
II Shree Radharamanno Vijayatey II
There is one Guru, who is called a ‘Nishiddha Guru’, who instructs what to do or what not to do! Not to do means by seeing we should not become like that! ‘Nishiddha’ means don’t become like this!
For example, like ‘Ravana’ is not seen with any respect, therefore it is a warning that don’t become like ‘Ravana’ in life.
Learning from someone’s life when you feel that we should not become like this. Like, when we see ‘Bheeshma’ in Mahabharata we don’t see any other character standing up to his stature but if we analyse his character then we learn that we should not be so rigid with any particular tradition that it becomes a burden and we are forced to compromise with our Dharma which weighs us down.
The second lesson is that nothing should be planned to harm anyone. Like, Shakuni gives a lot of advice to Duryodhana but it is only for harming the Pandavas in some way or the other.
The person who is only interested in harming the other person. His motive is negative! He gives political advice, advice about certain tenets of Dharma or doing some yantra or tantra, he is known as ‘Nishiddha Guru’ by our Shastras!
An intelligent person always stays away from such a person, though they too have a place of their own!
II Param Aaradhya Poojya Shreemann Madhva Gaudeshwar Vaishnavacharya Shree Pundrik Goswamiji Maharaj II
गुरुः निषिद्धः गुरुः । यत् अस्मान् एतत् न कर्तुं शिक्षयति। अकरणेन तं दृष्ट्वा एवम् न भवेयुः इत्यर्थः । निषिद्धस्य अर्थः न भवितुमर्हति।
यथा – यदि परम्परायाम् रावणस्य प्रति एतादृशी दृष्टिः भवति तर्हि जीवने कदापि रावणसदृशं न भवितुमर्हति इति अपि सार्थकम्।
यदा भवन्तः कस्यचित् जीवनं पश्यन्तः एतादृशं न भवितुमर्हति इति अनुभवन्ति। यथा भीष्मस्य दर्शनानन्तरं महाभारते भीष्मवत् को महान् भविष्यति इति वदामः, परन्तु तदनन्तरम् अपि अस्माभिः एकं वस्तु ज्ञातं यत् अस्माकं जीवने कस्यापि व्यवस्थायाः एतावत् आसक्तिः न कर्तव्या यत् अस्माकं धर्मस्य अपि सम्झौता कर्तव्या भवति।
द्वितीयः च अर्थः यत् ये भवतः अन्यस्य हानिं योजनां कुर्वन्ति। यथा शकुनी दुर्योधनं बहु उपदेशं ददाति तथा उपदेशः उत्तमः किन्तु सः पाण्डवानां हानिः कथं कर्तव्यः इति उपदेशं ददाति।
हानिमार्गे उत्साहं ददाति यः। तस्मिन् सुधारं न कृतवान्। यः कोऽपि राजनीतिविषये उपदेशं ददाति, धर्मस्य उपदेशं ददाति, कस्यापि यान्त्रिकव्यवस्थायाः उपदेशं ददाति सः शास्त्रेषु निषिद्धः गुरुः इति उच्यते।
बुद्धिमान् जनः तादृशात् दूरं तिष्ठति । तदपि आवश्यकम् ।
॥परमराध्य: पूज्य: श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य: श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ॥
