
श्री राधारमणो विजयते||
इस दुनिया में तुम्हें कोई भी चीज देखनी है उसके लिए प्रकाश की जरूरत है। एकमात्र सूर्य ही ऐसा है जिसको देखने के लिए कोई प्रकाश की जरूरत नहीं। सूर्य को देखने के लिए दिए की जरूरत नहीं। धरती में और कुछ भी देखना हो सबके लिए सूर्य की जरूरत है और अगर सूर्य ना हो तो दीए की जरूरत है।
रात में यही दुनिया है पर अगर सूर्य नहीं है तो इतनी लाइट लगानी पड़ती है तब कुछ दिखता है। सूर्य को देखने के लिए किसी दिए मोमबत्ती की जरूरत नहीं पड़ती, अपने आप उससे सब दिखने लग जाता है। तुम्हारे पास रोशनी हो फिर भी अगर सूर्य की रोशनी नहीं है तो कुछ नहीं दिखता। बस इसी प्रकार से
सद्गुरु की जब प्राप्ति होती है तो अपने आप आत्मा इस बात की संदेश दे देती है उसको परखने के लिए किसी दिए मोमबत्ती की जरूरत नहीं है। जैसे सूर्य का उदय होते ही अपने आप सब कुछ दिखाने लगता है ऐसे ही
सद्गुरु की प्राप्ति होते ही आत्मा ऐसे प्रकाशित होती है कि यह सब जो साधारण था, सब कुछ असाधारण सा दिखने लगता है। गोस्वामी जी की चौपाई कहती है-
सिया राम मय सब जग जानी
करहु प्रणाम जोर जुग वानी।।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
II Shree Radharamanno Vijayatey II
In order to see anything, light is necessary. The Sun is the only object where no light is needed to see it! You don’t need to light a lamp to see the Sun. For seeing anything on this earth you require the sunlight and in its absence you need a lamp.
At night to see this very world you require so much illumination to be able to see something. For seeing the Sun you don’t need to light a lamp or a candle because it is self effulgent and its light enables us to see everything. If you have a light source but if the sunlight is not there then nothing can be seen. In the same way;
When you attain your Sadguru then automatically the Atman confirms it and you don’t need any external source to identify him. Like, with the sunrise the entire world is illumined, similarly;
The moment you attain your Sadguru the Atman gets illuminated in such a way that what appeared ordinary till now seems to be extraordinary. Goswamiji’s Chaupai says –
‘Siya Rama mayya sab jaga jaani I Karahun pranam jori jugga paani II
II Param Aaradhya Poojya Shreemann Madhva Gaudeshwar Vaishnavacharya Shree Pundrik Goswamiji Maharaj II
यत्किमपि भवन्तः अस्मिन् जगति द्रष्टुम् इच्छन्ति तत् प्रकाशस्य आवश्यकता भवति। सूर्यः एव यस्य प्रकाशस्य दर्शनं न आवश्यकम्। सूर्यदर्शनार्थं दीपस्य आवश्यकता नास्ति। यदि भवन्तः पृथिव्यां अन्यत् किमपि द्रष्टुम् इच्छन्ति तर्हि भवन्तः सूर्यस्य आवश्यकतां अनुभवन्ति यदि सूर्यः नास्ति तर्हि भवन्तः दीपस्य आवश्यकतां अनुभवन्ति।
रात्रौ एषः एव जगत् किन्तु यदि सूर्यः नास्ति तर्हि एतावत् प्रकाशः तदा एव किमपि द्रष्टुं शक्यते। सूर्यदर्शनार्थं कस्यापि दीपकस्य आवश्यकता नास्ति, सर्वं स्वयमेव दृश्यमानं भवति। प्रकाशः अस्ति चेदपि यदि सूर्यप्रकाशः नास्ति तर्हि किमपि द्रष्टुं न शक्यते। एवं एव
सद्गुरुं प्राप्य आत्मा स्वयमेव एतत् सन्देशं ददाति, तस्य परीक्षणार्थं कस्यापि दीपकस्य आवश्यकता नास्ति । सूर्योदयमात्रं स्वयमेव सर्वं दर्शयितुं आरभते ।
सद्गुरुं प्राप्य आत्मा एतावत् प्रबुद्धः भवति यत् यत् किमपि साधारणं आसीत् तत् सर्वं असाधारणं दृश्यमानं भवितुं आरभते। गोस्वामी जी के चौपाई कहते-
सिया राम माय सब जग जानी
अहं भवन्तं उच्चैः नमस्कारं करोमि।
॥परमराध्य: पूज्य: श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य: श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ॥
