
भगवान क्या करते हैं ?
भगवान कुछ नहीं करते हैं भगवान केवल कृपा करते हैं। एक भवन में जैसे सूर्य की किरणें अलग-अलग जगह से आती है। कोई ऊपर वाली खिड़की से आती है ऊपर वाली चाँदनी से आती है कोई सामने वाली खिड़की से आती है कोई इधर से आई कोई उधर से आइ उसी प्रकार एक व्यक्ति के जीवन में कृपा के अलग-अलग रूप होते हैं।
किसी के जीवन में विपत्तियों से कृपा हो जाती है, किसी के जीवन में उन्नतियों से कृपा हो जाती है, किसी के जीवन में लाभ से कृपा हो जाती है, किसी के जीवन में हानि से कृपा हो जाती है, किसी को भगवान घर में रखकर ही कृपा का वर्षण करते हैं और किसी को घर से छुड़ाकर वृन्दावन कि वीथियों में लुण्ठित करते हुए कृपा का वर्षण कर देते हैं
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
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|| Shree Radharamanno Vijayatey ||
What does God do?
God does not do anything as such excepting showering His Divine Grace! Say, in a large mansion the sunlight enters from different places. Some light comes from the upper window, some through the ventilator, some from the front window, some from here or there or from different openings, in the same way the Divine Grace also has flows into our lives in different forms.
In some peoples lives the Grace comes in the form of calamities, in some cases it flows in the form of success and in others in the form of some gain or even the loss comes as Grace. On a few the Lord showers His grace while they are at home whereas in some others, they leave the house and are plundered with Grace while roaming in the lanes and by lanes of Shree Dham Vrindavan!
|| Param Aradhya Poojya Shreemann Madhv Gaudeshwara Vaishnavacharya Shree Pundrik Goswamiji Maharaj ||
श्री पुण्डरीक जी सूत्र (१२-०५-२०२३)
ईश्वरः किं करोति ?
ईश्वरः किमपि न करोति, ईश्वरः केवलं आशीर्वादं ददाति। भवने सूर्यकिरणाः भिन्नस्थानात् आगच्छन्ति। केचन ऊर्ध्वजालकात् आगच्छन्ति, केचन ऊर्ध्वचन्द्रप्रकाशात् आगच्छन्ति, केचन अग्रजालकात् आगच्छन्ति, केचन अस्मात् पार्श्वे आगच्छन्ति, केचन तस्मात् पार्श्वे आगच्छन्ति, तथैव अनुग्रहस्य व्यक्तिस्य जीवने भिन्नानि रूपाणि सन्ति।
कस्यचित् जीवनं विपत्तिभिः धन्यम्, कस्यचित् जीवनं प्रगत्या धन्यम्, कस्यचित् जीवनं लाभेन धन्यम्, कस्यचित् जीवनं हानिः धन्यम्, ईश्वरः कञ्चित् गृहे एव स्थापयति। सः स्वस्य आशीर्वादस्य वर्षणं करोति तथा च गृहात् कस्यचित् उद्धारं कुर्वन् वृन्दावनवर्षस्य गलियारे लोभयति ।
-परमराध्य: पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य: श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज।