
शालिग्राम जी पूर्ववत् ही पूर्णब्रह्म हैं। उन्हें बनाया नहीं जाता, वो प्राप्त हैं। वो जैसे हैं वैसे वहाँ धर दो, तुलसी चढ़ा दो, वैकुण्ठ नाथ प्रसन्न हो जाएंगे। पर जैसे गोस्वामीजी ने लिखा- बिनु पद चलहि, बिनु मुख खावहि, बिनु नेत्र देखहि।।
उसमें वो वृन्दावनानुभूति को, श्रीगुणमंजरी जी को श्रीश्यामसुन्दर की रूप माधुरी, श्रीप्रिया जु के आनुगत्य में प्राप्त हुई मदनमोहन, श्यामसुन्दर, गोविन्ददेव की वो मधुर नयनाभिराम प्रतिमूर्ति का जब अनुसंधान हुआ तब शालिग्राम से पूर्णब्रह्म से परिपूर्ण ब्रह्म का प्राकट्य हो गया।
यहाँ का प्रथम आकर्षण है कि ये सामने बैठा ठाकुर बनाया नहीं है, पाया नहीं है, चलकर आया है। ये वो विशुद्ध प्रेमामृत् है जिसका सब आस्वादन करते हैं। ऐसा अमृत दूसरी जगह नहीं है।
ऐसा परमात्मा कहीं प्रगटा नहीं, जैसा यहाँ है। सब जगह मूर्त और अमूर्त दोनों है, ये स्वयंभू हैं। काल्पनिक नहीं हैं, कृति से युक्त नहीं हैं। सुदृढ़, सुडौल, स्वरूपवान साक्षात् शालिग्रामशिला से आविर्भूत हैं।
॥परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
