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Pundrik Ji Sutra 23-5-2023

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24 May

By Pundrik Goswami

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Pundrik Ji Sutra 23-5-2023

धर्म केवल भगवान को ही पाने के लिए नहीं है। वो उसका एक प्रसाद है उसका एक परिणाम है। हम धर्माचरण करें भगवान को पाने के लिए, यह बहुत छोटी परिभाषा है। फिर रावण को कैसे प्रमाणित करोगे? कुछ भी कहो पर राम तो उसने भी देखें हैं, फिर कंस को कैसे प्रमाणित करोगे? कुछ भी कहो श्रीकृष्ण चलकर उसके महल में गये हैं।

धर्म का आचरण भगवद् प्राप्ति के लिए नहीं है। धर्म का आचरण इस जीवन को मानवीय व्यवस्था से जीने के लिए है। अगर आप मानवीय व्यवस्था से जीना चाहते हैं तो उसके लिए शास्त्र ने कुछ व्यवस्थाएँ बनाई हैं कि ऐसे करिए। इन तत्वों से प्रमाणित हो सकता है कि ये जो जीवन आपने जिया है ये मानवीय जीवन है। क्योंकि

आहार निद्रा भय मैथुनश्च सामान्य मेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मों हि एको अधिकोविषेशो धर्मेण हीना पशुभिसमाना।।

भोजन निद्रा भय और मैथुन ये चारों चीजें पशु भी करना जानते हैं। धंधा किए बिना भी शेर भूखा नहीं सोता। आहार की व्यवस्था है। नींद भी सबको अच्छे से आती है। जो मेहनत करता है नींद भी अच्छी आएगी। भय और मैथुन भी सबका एक ही है। सबकी एक ही प्रक्रिया है।

आहार निद्रा भय मैथुन आपने अगर केवल ये चार चीजें करी तो जीवन तो पशु के समान हुआ। यहाँ चार पैर पर चलने वाले को पशु नहीं कहा जाता। अंग्रेजी का एनिमल अलग होगा, पर संस्कृत का पशु अलग है। ऐसे देखा जाय तो हम गौ में इतनी श्रद्धा रखते हैं कि उनको पशु कहने में अपराध को बोध हो जाय। फिर वो तो चार पैर पर चलती है।

शरीर की आकृति से कोई पशु नहीं होता मन की विकृति से पशु होता है। मानव कौन? धर्मो हि एको अधिकोविषेशो।। मानव में और पशु में समानता है अगर ये चार चीजें ही करो तो पर धर्म ऐसा है जो व्यक्ति को पशु से अलग कर सकता है इसलिए धर्मेण हीना पशुभिसमाना।। जो धर्म से हीन है वो पशु के समान है।

हम धर्माचरण करते हैं मानव बनने के लिए। भगवान को पाना तो इसके बाद की बात है। वो पशु को भी मिल सकते है। हाथी ने पुकारा भगवान प्रकट हो गए। स्वयं भगवान गरुड की पीठ कर बैठकर चलते हैं। धर्माचरण करने से ये जीवन मानवीय होता है।

पर धर्म क्या है?शास्त्र ने दूसरी बात कही- धर्मस्य तत्वम् निहितम् गुहाय्।। धर्म का तत्व अत्यंत गुह्य है सूक्ष्म है। जैसे समुद्र को आजतक कोई नहीं समझ सका कि कितना गहरा है? ये ही है कहना कठिन हो जाएगा क्योंकि सनातन धर्म आपको अनुभव करने की सुविधा देता है।
इसलिए आप खोजने जाओ तो बड़ी जटिलता है क्योंकि एक ही के कितने पूर्व पक्ष खड़े हैं उसका पूर्व पक्ष अलग है प्रतिपक्ष अलग है। बड़ा झंझट है।

कोई कहता है कैसा भी पापी क्यों न हो गंगा में स्नान कर लो पाप कट जाएंगे तो फिर व्यक्ति कहेगा जब गंगा में स्नान करने से जब सारे पाप कटते हैं तो हमें जीने दीजिए जैसे जीना है। हाँ ये ध्यान रखेंगे मरते समय गंगा नहाले। अब इसका पूर्वप्रतिपक्ष बड़ा कठिन है।

एक तरफ अगर गंगा का एक बिंदु भी मिल गया तो दुर्गति सद्गति में बदल सकती है तो ये बात भी साथ में है सही नहीं है कि कोई गंगा के इस सद्गुण का दुरुपयोग करके अपने पूरे जीवन को दुराचार से जिए।

इसलिए धर्म का तत्व अत्यंत गुह्य है। तो क्या करे?
महान जनो येन गतस्पंथा।। जिसपर कोई महान गुरुजन चलते हों उस रास्ते पर हम चलें। वहाँ हमको मिलेगा। रास्ता न भी मिला हो पर सद्गुरु जन के श्रीचरणों के पीछे चलना।
हमें रास्तों की जरूरत नहीं है,
हमें तेरे पैरों के निशां मिल गए हैं…

।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।

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Shri Manmadhava Gaudeshwar Vaishnava Acharya Shri Pundrik Goswami Ji, is the Grandson of Famous Saint Shri Atul Krishna Goswami Ji Maharaj & son of famous Bhagwat orator Shri Shribhuti Krishna Goswami ji maharaj. He belongs to the family of Shri Gopal Bhatt Goswami ( One of the Famous Six Goswamis of Vrindavan who were inspired and initiated by himself Shri Chaitanya Mahaprabhu) who established the Radha Raman Temple in Vrindavan in 1542 and also his samadhi exists within the temple premises. Maharaj Sri is the 38th Acharya in the lineage of Gaudiya Parampara.

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