
श्री राधारमणो विजयते
तुम्हारी अनुभूतियों ने तुमको इतना परिपक्व बनाया है कि तुम अपने मन को ठाकुरजी के चरणों में चढ़ाने की व्यवस्था बना सको पर यह समय का विषय है, यह सावधानी का विषय है, यह साधना का विषय है; कृपा का विषय नहीं है।
कृपा तो तब होती है कि तुमको ठाकुर के अलावा कुछ और करने का मौका ही नहीं मिला हो, कहीं और जाने का अवसर ही ना मिला हो।
पर उस दशा पर पहुंचने के लिए कुछ बातें जरूरी हैं। क्योंकि उस स्थिति तक अगर तुमको कोई रोक सकता है तो वो केवल एक चीज है- तुम्हारा प्रारब्ध। एक चीज है जो तुमको अवरुद्ध कर सकती है।
प्रारब्ध क्या है? ज्यादा कुछ नहीं है; जो किया था उसकी दिशा बदल करके तुम्हारे जीवन में आ जाना प्रारब्ध है। पहले उसका उत्स तुम थे और अंत कोई और था, प्रारब्ध बस इतना सा है कि उसका उत्स कोई और हो जाएगा और उसका अंत तुम हो जाओगे।
एवरी एक्शन दियर इज इक्वल एंड अपॉजिट रिएक्शन।।
उस एक्शन का रिएक्शन प्रारब्ध है।
इसलिए इस बात का ध्यान रखना कि की गई सारी साधना, किया गया सारा भजन, किया गया सारा सत्संग; कहीं तुम्हारे किए गए एक अपवाद के द्वारा बर्बाद ना हो जाए।
हजारों लीटर दूध को बर्बाद करना हो तो एक नींबू काफी है, जिंदगी भर की हुई साधना को बर्बाद करना हो तो वासना का एक बिंदु काफी है। तुम सद् चाहे जितना मिला लो फर्क नहीं पड़ता पर अगर एक बूंद असद की पड़ गई तो सारी की सारी चीज बर्बाद हो जाएगी।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
||Shree Radharamanno Vijayatey||
Your experiences have made you so strong that you can prepare to offer your mind at the Lotus Feet of Shree Thakurji but it takes time, it needs proper care and attention, it is subject to the level of your Sadhana; it is not only a subject of grace!
Grace flows when you don’t think of anything else other than Shree Thakur and have no where else to go except Him!
To attain that state, certain things are necessary. If anything can stop you from attaining that state then it is only your Prarabdha or destiny! This can become a major obstacle on your path!
What is destiny or Prarabdha? It is nothing else but whatever you have done in the past has been destined in a different way for you to go through! Earlier, you were its origin and end was someone else but now as destiny it is just the reverse, i.e., the origin is someone else but it culminates through you!
Every action has an equal and an opposite reaction!
The reaction of that action is destiny.
That is why, please keep this in mind that all the Sadhana that you perform, all your Bhajan, all the Satsang you do; should not go to nought just by a careless wrong action of yours!
To spoil thousands of literes of milk, just one lemon is enough. In the same way, the lifelong Sadhana can get completely destroyed by a drop or an iota of Vaasana or lust! You may accumulate as much good as you like but just a wee bit of bad or a wrong deed will burn everything down!
||Param Aaradhya Poojya Shreemann Madhva Gaudeshwar Vaishnavacharya Shree Pundrik Goswamiji Maharaj||
भवतः अनुभवैः भवतः एतावत् प्रौढता कृता यत् भवतः मनः ठाकुरजी-चरणयोः अर्पणस्य व्यवस्थां कर्तुं शक्यते, परन्तु एषः कालस्य विषयः, एषः सावधानतायाः विषयः, एषः साधनायाः विषयः अस्ति न प्रसादस्य विषयः।
आशीर्वादः यदा भवतः ठाकुरात् परं किमपि कर्तुं अवसरः न प्राप्तः, अन्यत्र गन्तुं अवसरः न प्राप्तः।
परन्तु तस्याः अवस्थायाः प्राप्त्यर्थं केचन विषयाः आवश्यकाः सन्ति । यतः यदि कोऽपि भवन्तं तावत्पर्यन्तं निवारयितुं शक्नोति तर्हि एतत् एकमेव वस्तु – भवतः दैवम्। एकं वस्तु अस्ति यत् भवन्तं अवरुद्धुं शक्नोति।
दैवं किम् ? बहु किमपि नास्ति; कृतस्य दिशां परिवर्त्य भवतः जीवने आगन्तुं नियतम् अस्ति। पूर्वं तस्य उत्पत्तिः भवतः आसीत् तस्य अन्तः अन्यः आसीत्, दैवं केवलं यत् तस्य उत्पत्तिः अन्यः भविष्यति तस्य अन्तः भवतः भविष्यति।
तत्र प्रत्येकं कर्म समविपरीतप्रतिक्रिया भवति।
तस्य कर्मस्य प्रतिक्रिया नियतम्।
अतः मनसि धारयतु यत् सर्वाणि साधनानि कृतानि, सर्वाणि भजनानि कृतानि, सर्वाणि सत्संगानि कृतानि; भवता कृतेन एकेन अपवादेन न नष्टं भवतु।
यदि क्षीरस्य लीटरसहस्राणि अपव्ययितुम् इच्छसि तर्हि एकं निम्बूकं पर्याप्तम् । यदि भवन्तः जीवनपर्यन्तं कृतं भक्तिं अपव्ययितुं इच्छन्ति तर्हि कामस्य एकः बिन्दुः एव पर्याप्तः । भवन्तः यथा इच्छन्ति तावत् कियत् मिश्रयन्ति इति महत्त्वं नास्ति, परन्तु यदि असदस्य एकः बिन्दुः अपि तस्मिन् प्रविशति तर्हि समग्रं वस्तु नष्टं भविष्यति।
॥परमराध्य: पूज्य: श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य: श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ॥
