Radharamano Vijayate

Hindi —
*कथा सूत्र*
*मनमाधवगौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज*
गुरुदेव महाराज कहते हैं, कि वैष्णव अपराध क्या है? सबसे पहले हमें यह समझना होगा, कि क्या हम वैष्णव हैं? वैष्णव अपराध तो उसके प्रति होगा, जो पहले खुद वैष्णव है। इस बात की ढाल बनाकर कई लोग निकलना चाहते हैं। माथे पर तिलक लगाया, धोती पहनी, और कुछ भी काम कर दिया। सामने वाले ने कुछ कहा, तो वह बोले कि ए तू वैष्णव अपराध कर रहा है। जो अपने आप को खुद अपने मुंह से वैष्णव कहता है, वह इस धरती पर कभी वैष्णव हो ही नहीं सकता। तुलसीदास जी अपने मुंह से कह रहे हैं, कि मोसम कौन कुटिल ख़लकामी। हम तो वैष्णवों की चरण धूल ही के समान भी नहीं है। वैष्णव अपराध किसको कहते हैं? वैष्णव अपराध कब होता है? जब हम किसी के प्रति ईर्ष्या पैदा करते हैं कोई भूल कर रहा है, और उसकी उसकी भूल के प्रति बताना वैष्णव अपराध नहीं है। कोई भूल नहीं कर रहा है, और हमारे भीतर बड़ी तीव्र इर्ष्या है, फिर हम उसकी निंदा कर रहे हैं, तब हमारे द्वारा वैष्णव अपराध हो रहा है।32 प्रकार के अपराधों में नाम अपराध, धाम अपराध, वैष्णव अपराध लिखे हैं। लेकिन सबसे भीषण वैष्णव अपराध ही है। गुरुदेव महाराज कहते हैं कि वैष्णव अपराध से निवृत होने का कोई समाधान ही नहीं है। उसका एक ही समाधान है, कि ठाकुर जी से जाकर प्रार्थना करो, नाम स्मरण करो। हमारे द्वारा वैष्णव अपराध तब होता है जब हमारे भीतर भी अभिमान आता है, कि हम कुछ हैं। जैसे एक भक्त हुए पुंडलीक विद्या निधि वह जगन्नाथ जी गए तो वहां के पंडा के प्रति उनके मन में अपराध आ गया। तो जगन्नाथ जी इनके स्वप्न में आकर डंडे से पिटाई करी। इसी तरह चैतन्य महाप्रभु के साथ जो उनके विद्यार्थी थे वह गया में गए, तो वहां के पंडा के प्रति उनके मन में अपराध आ गया। तो चैतन्य महाप्रभु ने किया किया तो कुछ नहीं खुद को बुखार चढ़ा लिया। सब ने पूछा कि यह कैसे उतरेगा। तो उन्होंने कहा, कि जहां के जितने पंडा, तीर्थ जन है, उन सबके चरणों की धूल ही लाकर पानी में घोलकर मेरे माथे पर लगाओ, तब मेरा बुखार उतरेगा। तो सबको समझ आ गया, कि महाप्रभु अपना नहीं हमारा बुखार उतर रहे हैं। *जब हमारे भीतर ईर्ष्या और अभिमान आता है तो हमारे भीतर वैष्णव अपराध की भूमिका बनती है*। वह अपराध भी तभी होगा कि जिसके प्रति हुआ, वह भी वैष्णव ही हो। वह वैष्णव हो ही ना, तो फिर काहे बात का अपराध। सबसे बड़ा बचाव का साधन है, कि हमें सावधान रहना चाहिए। यही सबसे बड़ा साधन है, विनम्र रहें।
*गुरुदेव समर्पणम*
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन माध्व गोडेशवर वैष्णवआचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महराज ||
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